झीलों की नगरी

  • नैनीताल जिला झीलों की नगरी के नाम से भी विख्यात है।
  • यह नगर लड़ियां कांटा , तीनों ओर से टिफिन टॉप, चायनापीक , हाड़ी गडी ,शेर का डांडा , पहाड़ियों से घिरा हुआ है। नैनीताल1938 मीटर ऊंचाई पर स्थित है।
  • नैनीताल में सबसे अधिक झीले पाई जाती हैं। यह एक पर्यटक स्थल है जहां पर लोग दूर-दूर से आते हैं।
  • नगर के बीच में है नैनीताल ( नैनी झील) स्थित है, इस ताल की लंबाई लगभग 1500 मी. , इसकी चौड़ाई 510 मी. तथा इसकी गहराई 10 – 150 मी. है।
  • (आयर पात , देव पात , हाड़ीगदी , चायना पीक , स्नोव्यों , आलम सरिया कांटा, शेर का डांडा) इन 7 पहाड़ियों से घिरा हुआ है।
  • ताल के दोनों ओर से सड़क बनी हुई है। ताल का निचला भाग तल्लीताल ऊपरी भाग मल्लीताल कहलाता है। नैनीताल को कुमाऊ कमिश्नरी का मुख्यालय 1855 में बैटन के कार्यकाल के दौरान बनाया गया .
  • काठगोदाम तक रेल लाइन 1884 में तथा 1891 में जिला मुख्यालय बन जाने के बाद नैनीताल नगरी का तेजी से विकास हुआ।
  • मल्लीताल में राजभवन या सचिवालय भवन की स्थापना 1900 में की गई थी, 1962 से उ. प्र.की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में उपयोग किया जाता था।
  • 9 नवंबर 2000 से राज्य निर्माण के बाद इसी भवन में उत्तराखंड उच्च न्यायालय को स्थान्तरित किया गया है।

नैनीताल जिले के प्रमुख दार्शनिक स्थल

नैना देवी मंदिर

मल्लीताल के पास मां नैना देवी का बहुत अद्भुत मंदिर स्थित है। यह नैनी झील के किनारे स्थित है

नैना देवी मंदिर का निर्माण श्री मोतीराम शाह जी ने कराया था जो 1880 के भीषण भूस्खलन में नष्ट हो गया था।

उसके बाद दबी हुई मूर्ति को निकालकर वर्तमान में नए सिरे से मंदिर का निर्माण कराया गया 1882 में ज्येष्ठ नवमी इसकी पुन : स्थापना की गई।

नैनापीक

नैनापीक नैनीताल की सबसे ऊंची चोटी जो 26 11 मीटर ऊंची है नैनीताल से यह चोटी 5.5 किमी की दूरी पर स्थित है।

नैना पीक से अद्भुत छटा को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

स्नो व्यू

2270 मी. ऊंचाई पर स्नोव्यू शिखर स्थित है । जो बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक स्थल है इस शिखर पर पैदल मार्ग द्वारा जाया जाता है।

नैनी झील

नैनी झील नैन ( आंख) के आकार वाली झील नैनीताल की पहचान है।

यह झील सात पहाड़ियों से घिरी हुई है इस झील के नाम से नैना देवी का नाम भी जुड़ा है।

कथाओं के अनुसार भगवान शिव देवी सती के मृत शरीर को ले जा रहे थे उनकी आंख यहां पर गिरी और झील का निर्माण हो गया। इसको त्रि ऋषि सरोवर भी कहा जाता है.

नलताल

नलताल को कमल ताल के नाम से भी जाना जाता है।

क्योंकि पुष्प की प्रचुलता के कारण इसे कमल ताल कहां गया यह नैनीताल नगर से 27 किमी की दूरी पर स्थित है।

भवाली

यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण तथा फल बाजार के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा ब्रिटिशकाल के बहुत से बागान यहां स्थित हैं.

यह समुद्रीतल से 1106 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है तथा नैनीताल से 11 किमी की दूरी पर स्थित है।

भीमताल

यह स्थल नैनीताल को एक अद्भुत दृश्य प्रदान करता है जो पर्यटकों के लिए मन को मोहने वाला दृष्टि प्रदान करता है।

इस झील की समुद्र तल से ऊंचाई 1370 मीटर की है। यह नैनीताल से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है

तथा भवाली से 11 किलोमीटर की दूरी पर है.

भीमताल झील के बीच में एक टापू है जिस पर एक एक्वेरियम बना है.

कैंची धाम

यह धाम नीम करोली महाराज द्वारा बसाया गया है। कैंची धाम नैनीताल अल्मोड़ा मोटर मार्ग पर भवाली से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर मुख्यतः हनुमान जी का मंदिर है.

यह मंदिर आज तीर्थाटन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया है। इस धाम में 15 जून को हर वर्ष विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।

लैण्डस एंड

यहां से पर्वत श्रंखलाओ का अद्भुत दृश्य तथा यहां से खुर्पाताल का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यह नैनीताल से 4.08 किमी की दूरी पर स्थित है।

कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

हेली राष्ट्रीय उद्यान के नाम से 1936 में स्थापित इस उद्यान को वर्तमान कार्बेट नेशनल पार्क नाम 1957 में मिला।

यह 520.82 वर्ग किमी( 312 .76 वर्ग किमी पौड़ी में व 208.8 वर्ग किमी क्षेत्र नैनीताल में) क्षेत्र में विस्तारित है।

अन्य उद्यानों की अपेक्षा इस राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटक अत्यधिक आते हैं।

इसका प्रवेश द्वार ढिकाला ( नैनीताल) में है। पाटली दून व कोटा दून यहीं स्थित हैं.

कालाढूंगी

इस स्थान पर जिम कार्बेट का मकान और संग्रहालय वन्य प्रेमियों का मुख्य आकर्षण का केंद्र है। यह नैनीताल से 50 किमी तथा कार्बेट से 35 किमी की दूरी पर स्थित है।

राजकीय वेधशाला

1651 मीटर ऊंची पहाड़ी पर नैनीताल की वेधशाला स्थित है। यह शहर से 4.4 किमी की दूरी पर स्थित है।

घोड़ाखाल स्कूल

नैनीताल जिले से लगभग 15 किमी दूरी पर घोड़ाखाल नामक स्थान स्थित है।

काठगोदाम

यह रेलवे स्टेशन 1884 में शुरू हुआ था . यह रेलवे का कुमाऊं क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन मन जाता है तथा यह स्टेशन कुमाऊं का प्रवेश द्वार कहलाता है।

क्योंकि कुमाऊं की प्रवृत्ति क्षेत्रों एवं पर्यटन स्थलों को देश के अन्य भागों से जोड़ता है, 1994 में इसे बड़ी लाइन बनाया गया था। काठगोदाम के निकट ही गुलाब घाटी स्थित है.

हल्द्वानीhttps://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80

यह राज्य का सबसे बड़ा व्यापारिक नगर है।इस नगर में हल्दु के पेड़ों की अधिकता के कारण इसे हल्दुवणी गया है।

चंद राजा रूपचंद के समय पर सोलवीं शादी में गौला नदी तट पर बस्तियां बनी हुई थी जहां वर्तमान में अभी हल्द्वानी शहर स्थित है

हल्द्वानी नाम 1834 में कमिश्नर विलियम ट्रेल द्वारा यह नाम दिया । कमिश्नर रैमजे ने इस क्षेत्र में अनेक नहरे बनवायी । वर्तमान में यह महानगर तथा नगर निगम के अंतर्गत आता है.

मुक्तेश्वर

यह क्षेत्र बांज बुरांश तथा फलदार वृक्षों के घने जंगलों से घिरा हुआ है । हल्द्वानी नगर से 51 किमी की दूरी पर स्थित है। यह समुद्र तल से 3000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर भारतीय पशु चिकित्सा शोध संस्थान (1894 में स्थापित ) तथा मुक्तेश्वर मंदिर स्थित है।

रामगढ़

यहां पर सेव नाशपाती तथा प्राकृतिक सुंदरता दिखाई पड़ती है। स्थान मुक्तेश्वर से कुछ ही दूरी पर स्थित है। इसके पास गागर नामक स्थान भी है। महादेवी वर्मा तथा रविंद्र नाथ टैगोर ने प्रवास किया था। इसलिए यहाँ पर मीरा कुटिया तथा टैगोर टॉप भी स्थित है.

यहाँ पर महादेवी वर्मा की स्मृति में एक संग्रहालय भी है।

रामनगर

इस नगर को कमिश्नर रैमजे ने 1850 में बसाया था, यह कोसी तट पर स्थित है। काशीपुर मुरादाबाद रेल का अंतिम स्टेशन है।

ढिकाला जो कि कॉर्बेट का प्रवेश द्वार यहां से बहुत नजदीक है।

गर्जिया

यहां महर्षि वाल्मीकि आश्रम के अवशेष आज भी मौजूद हैं। यह स्थान रामनगर से 10 किमी दूरी पर रानीखेत मार्ग पर स्थित तथा कोसी नदी के बीचो बीच गर्जिया देवी मंदिर स्थित है।

यहां से कुछ ही दूरी पर सीतावनी है । ऐतिहासिक काल में ढिकुली में कत्यूरीयो की राजधानी भी थी। यहां से बौद्ध कालीन मूर्तियां भी पाई गई हैं।

वर्तमान समय में नैनीताल ना केवल उत्तराखंड वरन भारत के भी सर्वश्रेष्ठ हिल स्टेशन के रूप में भी विश्व प्रसिद्ध है.

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