आद्य ऐतिहासिक काल ( पौराणिक काल )

उत्तराखंड का आद्य ऐतिहासिक काल

आद्य ऐतिहासिक काल को पौराणिक काल भी कहा जाता है। 3000-600 ई0 पू0

पुरातात्विक स्रोत

पौराणिक ग्रंथों

पौराणिक ग्रंथों – उत्तराखंड का प्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद से प्राप्त होता है।

ऋग्वेद में उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है।

ऐतरेव ब्राह्मण ग्रंथ में उत्तराखंड को उत्तरकुरु कहा गया है।

ब्राह्मण ग्रंथों में उत्तराखंड के लिए बद्रीनाथ का नाम आया है।

कौशीतकी ब्राह्मण में लिखा है- वाक् देवि का निवास स्थान बद्री आश्रम कहा गया है।

उत्तराखंड की पावनता की प्रशंसा में केदारखंड एवं मानस खंड नामक दो प्रसिद्ध ग्रंथ हैं जोकि स्कंद पुराण के अंश है।

स्कंद पुराण में 5 हिमालयी खंडों( नेपाल, मानस खंड, केदारखंड, जालंधर, कश्मीर) का उल्लेख किया गया है।

नोट – मानस खंडे, केदारखंड उत्तराखंड से संबंधित है। ( स्कंद पुराण)

स्कंद पुराण में गढ़वाल को केदारखंड कहा गया है तथा कुमाऊं को मानस खंड कहां गया है।

मानस खंड- वर्तमान का कुमाऊं क्षेत्र है

केदारखंड- वर्तमान का गढ़वाल क्षेत्र है

केदारखंड- माया क्षेत्र/ गंगाद्वार/ हरिद्वार से लेकर श्वेत पर्वत( हिमालय) तक के विस्तृत क्षेत्र को कहा गया है।

केदारखंड को माया क्षेत्र/ गंगा द्वार/ हरिद्वार इन सभी नामों से भी जाना जाता है।

तमसा( टोंस नदी) से लेकर बौद्धांचल ( नंदा) पर्वत (बधाण नंदा देवी) तक क्षेत्र को भी केदारखंड कहा जाता है।

मानस खंड- नंदा देवी पर्वत से कालगिरी तक के विस्तृत क्षेत्र को मानस खंड( कुमाऊं क्षेत्र) कहा गया है।

बधाण

बधाण एक पर्वत श्रेणी जो वर्तमान में नंदा देवी पर्वत के नाम में से जाना जाता है। नंदा देवी पर्वत मानस खंड एवं केदारखंड की विभाजन रेखा पर स्थित है ( कुमाऊं एवं गढ़वाल को अलग करता है)

पुराणों में उत्तराखंड को इतना पुनीत स्थान माना गया है। जिसमें जन्म लेने के लिए देवता भी तरसते हैं।

पुराणों में मानस खंड( वर्तमान का कुमाऊं) एवं केदारखंड( वर्तमान का गढ़वाल) के संयुक्त क्षेत्र को- उत्तरखंड, ब्रह्मापुर एवं खासदेश आदि नामों से जाना जाता है।

बौद्ध साहित्य के पाति भाषा वाले ग्रंथ में उत्तराखंड के लिए हिमवंत शब्द प्रयुक्त किया गया है।

उत्तराखंड को पुराणों, उपनिषदों एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में पूर्ण भूमि, ऋषि भूमि तथा पवित्र क्षेत्र भी कहा गया है।

प्राचीन काल में को तपोभूमि, बद्री आश्रम, केदारखंड कहां गया है।

उत्तराखंड को निम्न नामों से भी जाना जाता है-

आद्यशक्ति पर्वतों की जन्मभूमि

प्राचीन काल में ऋषियो की भूमि

प्राचीन काल में आर्यों का आदि निवास स्थान

मध्यवर्ती हिमालय का आंचल

7 नदियों का संधि स्थल

पुरातात्विक स्रोत-

1-कप मार्क्स

2-ताम्र उपकरण

3-महापाषाणीय शवाधान

4-धूसर मृदभांड

कप मार्क्स-

ओखली की आकार के गोल – गोल गड्ढे कपमार्क्स कहलाते हैं।

1856 में विलियम जे. हेनवुड ने चंपावत के देवीधुरा में प्राप्त कप मार्क्स का विवरण दिया।

1877 में रिवेट कारनक को अल्मोड़ा के द्वाराहाट के चंद्रेश्वर मंदिर के निकट 200 कपमार्क्स प्राप्त हुए।

इसके अतिरिक्त डॉ यशोधर मठपाल जी को प. रामगंगा घाटी में नौला गांव में 72 कपमार्क्स खोजे गए ,

(नौ गांव, जोयो गांव में भी मठपाल जी को ये कप मार्क्स प्राप्त हुए)

डॉक्टर महेश्वर प्रसाद जोशी को कुमाऊं के जसकोट , खैखन , देवीधुरा में कप मार्क्स प्राप्त हुए।

वही गढ़वाल में डॉ यशवंत कटोच को गोपेश्वर व पश्चिमी नयार घाटी में कप मार्क्स प्राप्त हुए।

ताम्र उपकरण-

सर्वप्रथम बहदराबाद ( हरिद्वार) से 1951 में भालाग्र , रिंग्स , चूड़ियां आदि प्राप्त हुए।

1986 में ( अल्मोड़ा) से, 1989 में बनकोट( पिथौरागढ़) . 1999 में नैनीताल( पिथौरागढ़) से मानव आकृतियों के समान ताबे धातु की आकृतियां मिली

H.D. संकालिया ने बहदराबाद से प्राप्त मृदभांडो की तुलना गोदावरी घाटी से प्राप्त मृदभांडो से की है।

इसके साथ उपरोक्त स्थलों से धूसर मृदभांडो की प्राप्ति हुई ।

महापाषाणीय शवाधान-

1956 में शिव प्रसाद डबराल चारण ने चमोली के मलारी ग्राम से महापाषाणीय शवाधान वह अवशेष खोजें।

इन शवाधानो के साथ-साथ अवशेषों के साथ छोड़े, भेड़ तश्तरिया ,टोंटी , कुतुप आदि भी प्राप्त होते हैं।

इसके बाद 1983 में गढ़वाल विवि के इतिहास विभाग ने फिर से क्षेत्र का बृहद सर्वेक्षण किया जिसमें लाल काले धूसर मृदभांड, कुतुप , लोहा उपकरण, कुत्ते,बकरी आदि के कंकाल भी प्राप्त हुए।

2002 में फिर से गढ़वाल विवि को 10 तश्तरिया , कांसे का कटोरा व 5 किलो का सोने का मुखौटा प्राप्त हुआ।

अल्मोड़ा के नौला जैनल व प. रामगंगा घाटी भी महापाषाणीय शवाधान प्राप्त हुए।

धूसर मृदभांड-

अलकनंदा घाटी में थापली ( टिहरी ) यमुना घाटी पुरोला( उत्तरकाशी) व प. रामगंगा घाटी से चित्रित धूसर मृदभांड प्राप्त हुए हैं।

इसके अतिरिक्त गोविषाण से 2600 ई. पू. की ईट प्राप्त हुई है। जिससे यह सिद्ध होता है कि इस स्थान का एक व्यापारिक नगर के रूप में अस्तित्व बन चुका था।

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